यह पोस्ट माननीय सुरेश चिपलूनकर जी के ब्लॉग “महाज़ाल पर सुरेश चिपलूनकर” से लिया गया है जिसके लिए सुरेशजी का आभार
अश्लील फिल्मों के टीवी प्रसारण को अनुमति सम्भव
अगस्त 28, 2009सूचना और प्रसारण मंत्रालय डीटीएच, सीएएस और आईपीटीवी जैसे उन माध्यमों के जरिए वयस्क दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई ‘आशिंक नग्नता’ और ‘अश्लीलता’ वाली विदेशी फिल्मों के प्रसारण को अनुमति देने पर विचार कर रहा है।
सूत्रों के अनुसार इन माध्यमों पर ऐसी फिल्मों के प्रसारण के लिए समय संबंधी कोई बंदिशें नहीं होगी और ऐसी फिल्में किसी भी समय प्रसारित की जा सकेंगी। दरअसल केबल से चैनलों के प्रसारण के माध्यमों पर वयस्क सामग्रियां और ऐसी फिल्में रात ग्यारह बजे से लेकर सुबह चार बजे के बीच ही दिखाई जा सकती हैं भले ही उन्हें भारतीय सेंसर बोर्ड से मंजूरी मिल चुकी हो।
हालांकि मंत्रालय के पास इस तरह का प्रस्ताव पिछले दो साल से लम्बित है, लेकिन अब तक इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी गई है। लेकिन सरकार और प्रसारकों के बीच प्रस्तावित ‘कंटेट कोड’ पर सहमति बन रही है और समझा जाता है कि इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी जाएगी। लेकिन इसमें कितना समय लगेगा यह पता नहीं चला है।
इस समय विदेशी भाषाओं की सभी फिल्मों, यहां तक कि उन फिल्मों को भी जिन्हें अपने देश से वयस्क फिल्म का प्रमाण पत्र मिल चुका है, उन्हें भारत में दिखाने के लिए भारतीय सेंसर बोर्ड से मंजूरी लेनी पड़ती है। केबल टेलीविजन कानून के तहत मौजूदा कार्यक्रम संहिता के अनुसार बोर्ड की मंजूरी लेने के लिए ऐसी फिल्मों के आपत्तिजनक हिस्सों को हटाना या उनमें संशोधन करना पड़ता है।
सूत्रों का कहना है कि वयस्क विदेशी फिल्मों के उक्त डिजिटल माध्यमों के जरिए प्रसारित करने के प्रस्ताव को लेकर मंत्रालय के अधिकारियों तथा प्रसारकों के शीर्ष निकाय इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (आईबीएफ) के प्रतिनिधियों के बीच तीन से चार बैठकें होने के बाद ही इस प्रस्ताव को हरी झंडी मिल सकती है। अगर इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई तो यह प्रस्ताव कई साल पूर्व दूरदर्शन की ओर से तैयार दिशा-निर्देशों का स्थान ले लेगा।
इस समय 470 से अधिक चैनलों को आधिकारिक तौर पर देश में प्रसारण की अनुमति दी गई है। इनमें से करीब 45 प्रतिशत चैनल समाचार और सामयिक विषयों पर आधारित है और करीब 25 प्रतिशत देशी और विदेशी फिल्मों पर आधारित चैनल हैं। लेकिन इस समय देश भर में पांच हजार से अधिक स्थानीय केबल चैनल हैं जिन पर सरकार की निगरानी नहीं रह पाती और कुछ केबल चैनल नियमों का उल्लंघन करके प्रतिबंधित सामग्रियां भी प्रसारित करते हैं।
महाज़ाल पर सुरेश चिपलूनकर-काबा, एक शिव मन्दिर ही है… : कुछ तथ्य, कुछ विचित्र संयोग (भाग-1)
अगस्त 28, 2009हाल ही में एक सेमिनार में प्रख्यात लेखिका कुसुमलता केडिया ने विभिन्न पश्चिमी पुस्तकों और शोधों के हवाले से यह तर्कसिद्ध किया कि विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में बहुत गहरे अन्तर्सम्बन्ध रहे हैं। पुस्तक “फ़िंगरप्रिंट्स ऑफ़ द गॉड – लेखक ग्राहम हैन्नोक” तथा एक अन्य पुस्तक “1434″ (लेखक – गेविन मेनजीस) का “रेफ़रेंस” देते हुए उन्होंने बताया कि पश्चिम के शोधकर्ताओं को “सभ्यताओं” सम्बन्धी खोज करते समय अंटार्कटिका क्षेत्र के नक्शे भी प्राप्त हुए हैं, जो कि बेहद कुशलता से तैयार किये गये थे, इसी प्रकार कई बेहद प्राचीन नक्शों में कहीं-कहीं चीन को “वृहत्तर भारत” का हिस्सा भी चित्रित किया गया है। अब इस सम्बन्ध में पश्चिमी लेखकों और शोधकर्ताओं में आम सहमति बनती जा रही है कि पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व 12,000 वर्ष से भी पुराना है, और उस समय की कई सभ्यताएं पूर्ण विकसित थीं।
हालांकि “काबा एक शिव मन्दिर है”, इस लेखमाला का ऊपर उल्लेखित तथ्यों से कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन जैसा कि केडिया जी ने कहा है कि विश्व का इतिहास जो हमें पढ़ाया जाता है या बताया जाता है अथवा दर्शाया जाता है, वह असल में ईसा पूर्व 4000 वर्ष का ही कालखण्ड है और Pre-Christianity काल को ही विश्व का इतिहास मानता है। लेकिन जब आर्कियोलॉजिस्ट और प्रागैतिहासिक काल के शोधकर्ता इस 4000 वर्ष से और पीछे जाकर खोजबीन करते हैं तब उन्हें कई आश्चर्यजनक बातें पता चलती हैं।
यह प्रश्न कई बार और कई जगहों पर पूछा गया है कि क्या मुस्लिमों का तीर्थ स्थल “काबा” एक हिन्दू मन्दिर है या था? इस बारे में काफ़ी लोगों को शक है कि आखिर काबा के बाहर चांदी की गोलाईदार फ़्रेम में जड़ा हुआ काला पत्थर क्या है? काबा में काले परदे से ढँकी हुई उस विशाल संरचना के भीतर क्या है? क्यों काबा के कुछ इलाके गैर-मुस्लिमों के लिये प्रतिबन्धित हैं? आखिर मुस्लिम काबा में परिक्रमा क्यों करते हैं? इन सवालों के जवाब में सबसे प्रामाणिक और ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों के साथ भारतीय इतिहासकार पीएन ओक तथा हिन्दू धर्म के प्रखर विद्वान अमेरिकी इतिहासकार स्टीफ़न नैप की साईटों पर कुछ सामग्री मिलती है। इतिहासकारों में पीएन ओक के निष्कर्षों को लेकर गहरे मतभेद हैं, लेकिन जैसे-जैसे नये-नये तथ्य, नक्शे और प्राचीन ग्रन्थों के सन्दर्भ सामने आते जा रहे हैं, हिन्दू वैदिक संस्कृति का प्रभाव समूचे पश्चिम एशिया और अरब देशों में था यह सिद्ध होता जायेगा। कम्बोडिया और इंडोनेशिया में पहले से मौजूद मंदिर तथा बामियान में ध्वस्त की गई बुद्ध की मूर्ति इस बात की ओर स्पष्ट संकेत तो करती ही है। हिन्दू संस्कृति के धुर-विरोधी इतिहासकार भी इस बात को तो मानते ही हैं कि इस्लाम के प्रादुर्भाव के पश्चात कई-कई मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा गया, लेकिन फ़िर भी संस्कृति की एक अन्तर्धारा सतत मौजूद रही जो कि विभिन्न परम्पराओं में दिखाई भी देती है।
पीएन ओक ने अपने एक विस्तृत लेख में इस बात पर बिन्दुवार चर्चा की है। पीएन ओक पहले सेना में कार्यरत थे और सेना की नौकरी छोड़कर उन्होंने प्राचीन भारत के इतिहास पर शोध किया और विभिन्न देशों में घूम-घूम कर कई प्रकार के लेख, शिलालेखों के नमूने, ताड़पत्र आदि का अध्ययन किया। पीएन ओक की मृत्यु से कुछ ही समय पहले की बात है, कुवैत में एक गहरी खुदाई के दौरान कांसे की स्वर्णजड़ित गणेश की मूर्ति प्राप्त हुई थी। कुवैत के उस मुस्लिम रहवासी ने उस मूर्ति को लेकर कौतूहल जताया था तथा इतिहासकारों से हिन्दू सभ्यता और अरब सभ्यता के बीच क्या अन्तर्सम्बन्ध हैं यह स्पष्ट करने का आग्रह किया था।
जब पीएन ओक ने इस सम्बन्ध में गहराई से छानबीन करने का निश्चय किया तो उन्हें कई चौंकाने वाली जानकारियाँ मिली। तुर्की के इस्ताम्बुल शहर की प्रसिद्ध लायब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया में एक ऐतिहासिक ग्रन्थ है “सायर-उल-ओकुल”, उसके पेज 315 पर राजा विक्रमादित्य से सम्बन्धित एक शिलालेख का उल्लेख है, जिसमें कहा गया है कि “…वे लोग भाग्यशाली हैं जो उस समय जन्मे और राजा विक्रम के राज्य में जीवन व्यतीत किया, वह बहुत ही दयालु, उदार और कर्तव्यनिष्ठ शासक था जो हरे व्यक्ति के कल्याण के बारे में सोचता था। लेकिन हम अरब लोग भगवान से बेखबर अपने कामुक और इन्द्रिय आनन्द में खोये हुए थे, बड़े पैमाने पर अत्याचार करते थे, अज्ञानता का अंधकार हमारे चारों तरफ़ छाया हुआ था। जिस तरह एक भेड़ अपने जीवन के लिये भेड़िये से संघर्ष करती है, उसी प्रकार हम अरब लोग अज्ञानता से संघर्षरत थे, चारों ओर गहन अंधकार था। लेकिन विदेशी होने के बावजूद, शिक्षा की उजाले भरी सुबह के जो दर्शन हमें राजा विक्रमादित्य ने करवाये वे क्षण अविस्मरणीय थे। उसने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच फ़ैलाया, अपने देश के सूर्य से भी तेज विद्वानों को इस देश में भेजा ताकि शिक्षा का उजाला फ़ैल सके। इन विद्वानों और ज्ञाताओं ने हमें भगवान की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारे में बताकर एक परोपकार किया है। ये तमाम विद्वान, राजा विक्रमादित्य के निर्देश पर अपने धर्म की शिक्षा देने यहाँ आये…”।
उस शिलालेख के अरेबिक शब्दों का रोमन लिपि में उल्लेख यहाँ किया जाना आवश्यक है…उस स्र्किप्ट के अनुसार, “…इट्राशाफ़ई सन्तु इबिक्रामतुल फ़ाहालामीन करीमुन यात्राफ़ीहा वायोसास्सारु बिहिल्लाहाया समाइनि एला मोताकाब्बेरेन सिहिल्लाहा युही किद मिन होवा यापाखारा फाज्जल असारी नाहोने ओसिरोम बायिआय्हालम। युन्दान ब्लाबिन कज़ान ब्लानाया सादुन्या कानातेफ़ नेतेफ़ि बेजेहालिन्। अतादारि बिलामासा-रतीन फ़ाकेफ़तासाबुहु कौन्निएज़ा माज़ेकाराल्हादा वालादोर। अश्मिमान बुरुकन्कद तोलुहो वातासारु हिहिला याकाजिबाय्माना बालाय कुल्क अमारेना फानेया जौनाबिलामारि बिक्रामातुम…” (पेज 315 साया-उल-ओकुल, जिसका मतलब होता है “यादगार शब्द”)। एक अरब लायब्रेरी में इस शिलालेख के उल्लेख से स्पष्ट है कि विक्रमादित्य का शासन या पहुँच अरब प्रायद्वीप तक निश्चित ही थी।
उपरिलिखित शिलालेख का गहन अध्ययन करने पर कुछ बातें स्वतः ही स्पष्ट होती हैं जैसे कि प्राचीन काल में विक्रमादित्य का साम्राज्य अरब देशों तक फ़ैला हुआ था और विक्रमादित्य ही वह पहला राजा था जिसने अरब में अपना परचम फ़हराया, क्योंकि उल्लिखित शिलालेख कहता है कि “राजा विक्रमादित्य ने हमें अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकाला…” अर्थात उस समय जो भी उनका धर्म या विश्वास था, उसकी बजाय विक्रमादित्य के भेजे हुए विद्वानों ने वैदिक जीवन पद्धति का प्रचार तत्कालीन अरब देशों में किया। अरबों के लिये भारतीय कला और विज्ञान की सीख भारतीय संस्कृति द्वारा स्थापित स्कूलों, अकादमियों और विभिन्न सांस्कृतिक केन्द्रों के द्वारा मिली।
इस निष्कर्ष का सहायक निष्कर्ष इस प्रकार हैं कि दिल्ली स्थित कुतुब मीनार विक्रमादित्य के अरब देशों की विजय के जश्न को मनाने हेतु बनाया एक स्मारक भी हो सकता है। इसके पीछे दो मजबूत कारण हैं, पहला यह कि तथाकथित कुतुब-मीनार के पास स्थित लोहे के खम्भे पर शिलालेख दर्शाता है कि विजेता राजा विक्रमादित्य की शादी राजकुमारी बाल्हिका से हुई। यह “बाल्हिका” कोई और नहीं पश्चिम एशिया के बाल्ख क्षेत्र की राजकुमारी हो सकती है। ऐसा हो सकता है कि विक्रमादित्य द्वारा बाल्ख राजाओं पर विजय प्राप्त करने के बाद उन्होंने उनकी पुत्री का विवाह विक्रमादित्य से करवा दिया हो।
अथवा, दूसरा तथ्य यह कि कुतुब-मीनार के पास स्थित नगर “महरौली”, इस महरौली का नाम विक्रमादित्य के दरबार में प्रसिद्ध गणित ज्योतिषी मिहिरा के नाम पर रखा गया है। “महरौली” शब्द संस्कृत के शब्द “मिहिरा-अवली” से निकला हुआ है, जिसका अर्थ है “मिहिरा” एवं उसके सहायकों के लिये बनाये गये मकानों की श्रृंखला। इस प्रसिद्ध गणित ज्योतिषी को तारों और ग्रहों के अध्ययन के लिये इस टावर का निर्माण करवाया गया हो सकता है, जिसे कुतुब मीनार कहा जाता है।
अपनी खोज को दूर तक पहुँचाने के लिये अरब में मिले विक्रमादित्य के उल्लेख वाले शिलालेख के निहितार्थ को मिलाया जाये तो उस कहानी के बिखरे टुकड़े जोड़ने में मदद मिलती है कि आखिर यह शिलालेख मक्का के काबा में कैसे आया और टिका रहा? ऐसे कौन से अन्य सबूत हैं जिनसे यह पता चल सके कि एक कालखण्ड में अरब देश, भारतीय वैदिक संस्कृति के अनुयायी थे? और वह शान्ति और शिक्षा अरब में विक्रमादित्य के विद्बानों के साथ ही आई, जिसका उल्लेख शिलालेख में “अज्ञानता और उथलपुथल” के रूप में वर्णित है? इस्ताम्बुल स्थित प्रसिद्ध लायब्रेरी मखतब-ए-सुल्तानिया, जिसकी ख्याति पश्चिम एशिया के सबसे बड़े प्राचीन इतिहास और साहित्य का संग्रहालय के रूप में है। लायब्रेरी के अरेबिक खण्ड में प्राचीन अरबी कविताओं का भी विशाल संग्रह है। यह संकलन तुर्की के शासक सुल्तान सलीम के आदेशों के तहत शुरु किया गया था। उस ग्रन्थ के भाग “हरीर” पर लिखे हुए हैं जो कि एक प्रकार का रेशमी कपड़ा है। प्रत्येक पृष्ठ को एक सजावटी बॉर्डर से सजाया गया है। यही संकलन “साया-उल-ओकुल” के नाम से जाना जाता है जो कि तीन खण्डों में विभाजित किया गया है। इस संकलन के पहले भाग में पूर्व-इस्लामिक अरब काल के कवियों का जीवन वर्णन और उनकी काव्य रचनाओं को संकलित किया गया है। दूसरे भाग में उन कवियों के बारे में वर्णन है जो पैगम्बर मुहम्मद के काल में रहे और कवियों की यह श्रृंखला बनी-उम-मय्या राजवंश तक चलती है। तीसरे भाग में इसके बाद खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद के काल तक के कवियों को संकलित किया गया है। इस संग्रह का सम्पादन और संकलन तैयार किया है अबू आमिर असामाई ने जो कि हारुन-अल-रशीद के दरबार में एक भाट था। “साया-उल-ओकुल” का सबसे पहला आधुनिक संस्करण बर्लिन में 1864 में प्रकाशित हुआ, इसके बाद एक और संस्करण 1932 में बेरूत से प्रकाशित किया गया।
यह संग्रह प्राचीन अरबी कविताओं का सबसे आधिकारिक, सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण संकलन माना जाता है। यह प्राचीन अरब जीवन के सामाजिक पहलू, प्रथाओं, परम्पराओं, तरीकों, मनोरंजन के तरीकों आदि पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। इस प्राचीन पुस्तक में प्रतिवर्ष मक्का में आयोजित होने वाले समागम जिसे “ओकाज़” के नाम से जाना जाता है, और जो कि काबा के चारों ओर आयोजित किया जाता है, के बारे में विस्तार से जानकारियाँ दी गई हैं। काबा में वार्षिक “मेले” (जिसे आज हज कहा जाता है) की प्रक्रिया इस्लामिक काल से पहले ही मौजूद थी, यह बात इस पुस्तक को सूक्ष्मता से देखने पर साफ़ पता चल जाती है।
यह लेख माननीय सुरेश चिपलूनकर जी के ब्लॉग “महाज़ाल पर सुरेश चिपलूनकर” से लिया गया है जिसके लिए सुरेशजी का आभार
बाटला हाऊस मुठभेड़ की जांच हो: अर्जुन सिंह
अगस्त 25, 2009वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने भी अब समाजवादी पार्टी के सुर से सुर मिलाते हुए दिल्ली में गत वर्ष सितम्बर माह में हुए ‘बाटला हाऊस’ मुठभेड़ की जांच कराने की वकालत की है।
अर्जुन सिंह ने कथिततौर पर कहा कि स्वंय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मामले की जांच कराने के पक्ष में हैं। अर्जुन सिंह का कहना है कि बटला हाउस एनकाउंटर की न्यायिक जांच होनी चाहिए। अर्जुन सिंह ने कहा कि प्रजातंत्र में चीजें साफ होनी चाहिए और न्यायिक जांच से तमाम तरह के संदेह दूर हो जाएंगे।
कांग्रेस पार्टी की ओर से अभी तक अर्जुन सिंह के इस बयान पर आधिकारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
अर्जुन सिंह के बयान के बाद कांग्रेस के लिए नई मुसीबत गले पड़ गई है और विपक्षी दल भाजपा ने मांग की है कि सरकार इस मामले में अपना रुख स्पष्ट करे।
भाजपा के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि अर्जुन सिंह पार्टी में हाशिये पर हैं। अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए वे ऐसे शिगूफे छोड़ते रहते हैं। उनको उनकी राजनीति मुबारक हो लेकिन अगर उनके इस बयान से आतंकियों को बढ़ावा मिलता है तो ये दुख और आपत्तिजनक बात है।
उन्होंने कहा कि ये अर्जुन सिंह का बयान है या कांग्रेस का ये बात सरकार को साफ करनी चाहिए क्योंकि प्रधानमंत्री ने साफ कहा है कि बटला हाउस एनकाउंटर की जांच की जरूरत नहीं है और इंस्पेक्टर शर्मा को उन्होंने शहीद माना था। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस जांच के संबंध में दायर की गई एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया था।
मुठभेड़ और विवाद-
पिछले वर्ष 19 सितम्बर को दिल्ली पुलिस ने दिल्ली के जामिया इलाके में दिल्ली में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद एक तलाशी अभियान छेड़ा था।
इस दौरान सुबह लगभग ग्यारह बजे के आसपास जामिया इलाके में स्थित ‘बाटला हाऊस’ में पुलिस का आतंकवादियों से सामना हो गया और दोनों ओर से गोलीबारी शुरु हो गई।
पुलिस की जवाबी कार्रवाई में दो आतंकवादी ढेर हुए थे तथा एक जिंदा पकड़ लिया गया था। दो आतंकी भागने में सफल रहे थे।
इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के ‘एनकाउंटर विशेषज्ञ’ और जाबांज अफसर मोहन चंद्र शर्मा आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे।
पुलिस को आतंकवादियों के पास से एक एके-47, दो विदेशी पिस्तौल और तीन कंप्यूटर बरामद हुए थे।
मुठभेड़ के बाद सबसे पहले समाजवादी पार्टी महासचिव अमर सिंह ने इस मुठभेड़ के ‘फर्जी’ होने की आशंका जताई थी तथा मामले की जांच कराने की मांग की थी।
इसके बाद मामले ने तूल पकड़ लिया था और कुछ अन्य कांग्रेसी नेता, तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बेनर्जी तथा अन्य अल्पसंख्यक नेताओं ने भी सपा के सुर में सुर मिलाते हुए मुठभेड़ और शहीद श्री शर्मा की शहादत पर सवालिया निशान लगा दिए थे। इसके बाद यह मामला लोकसभा में भी गूंजा था।
Gujarat Police,Politician and Media
अगस्त 22, 2009As soon as the news about Ahmedbad blasts mastermind Abu Bashr’s arrest by Gujarat police anti terrorist Squad spread, Congress leader from Uttar Pradesh Ram Naresh Yadav reached to the house of Abu Bashr and consoled his parents. Ram Naresh Yadav also reportedly promised that he would take Abu Bashr’s wrongful arrest matter to the Congress high-command.
Soon after the arrests of Abu Bashr and 9 other Ahmedabad blasts accused, Lalu Prasad Yadav in Delhi talking to the reporters said that innocent people were being targeted by Narendra Modi and Gujarat police and innocent people(like Abu Bashr )should not be arrested. He continued to express his support to SIMI and sticked to his earlier statement that bane on SIMI was not necessary.
In Ahmedabad, on the occassion of Silk festival organized at Karnavati Club, Congress leader and Union Minister of Textile, Shankarsinh Vaghela talked to the reporters that police might have caught innocent Muslims as terrorists. He also expressed possibility that bombs in Surat were planted by Narendra Modi’s brigade for political gain.
In Delhi, jobless Congressman Digvijay Singh said in his interview that whenever BJP was in trouble, bomb blasts happened in the country. Digvijay Singh claimed that VHP and RSS were involved in bomb making.
And plenty of fashionable secular media persons too jumped in to telecast and publish Abu Bashr’s parents and brothers and villagers ‘our man is innocent’ brand statements.
Our Terrorist
Now look at the Irony. When our Congress men and their allies were passing all nonsense statements like these and more and section of our media was generating sympathetic stories about Abu Bashr and his family to woo Muslim, the man Abu Bashr whom they were trying to project as ‘The Great Indian innocent Muslim-2008 targeted by fascist Narendra Modi government’ was himself confessing his involvement in Ahmedabad blasts in presence of a resident judge.
Mufti Abu Bashr before the metropolitan magistrate JK Pandya at his Vastrapur Government officers colony resident on late Sunday evening in Ahmedabad admitted that the 26 July serial blasts in Ahmedabad were a result of meticulous planning with specific roles cut out for every individual. Disclosing that he had prior knowledge of the attacks, he also confessed before judge JK Pandya that the blasts were executed by Qayamuddin Kapadia Ilias Abdul Kapadia and his men. He agreed to reveal everything about the blasts to the police.
Judge JK Pandya then after sent Abu Bashr to 14 days remand. Abu Bashr was presented before the judge in connection with the Maninagar blasts. Maningar resident Harshad Halan had lodged a complaint on July 26 soon after the blasts in which he had stated that a cycle bomb had exploded when he and three others were at a tea stall near Maninagar square around 6.30-6.45 pm when a blast injured them all.
Other nine accused were presented before the urgent metropolitan magistrate in connection with blasts that occurred in the Civil hospital.
It should be noted that Qayamuddin Kapadia whom Abu Bashr claimed as a main conspirator of Ahmedabad blasts lives in Vadodara’s Yakutpura area. Police say he owns a factory ‘Mona Rubber Stamps’ on the outskirts of the city. He is evading arrest and on the top of absconding list.
Now so far, in police interrogation Abu Bashr has confessed that he was present in Ahmedabad on the day of the blasts. Bashr had made his base in Ahmedabad for two months and had stayed at a rented house in Vatva from where he controlled the entire operations.
So when even terrorist himself confessed his participation in Ahmedabad bomb blasts, champions of Muslim cause our politicians were singing different songs of ‘innocent Muslims being victimized’ and were acting like ‘B’ team of Indian Muzahidins.
Article Copied from www.deshgujarat.com
शाहरुख अमेरिका न जाएं
अगस्त 20, 2009शाहरुख खान अमेरिका गए – बस, तब से ऎसा हंगामा बरपा है कि क्या बताएं।
शाहरुख को अमेरिकी हवाई अड्डे पर उस पूछताछ का सामना करना पड़ा जो धरती के हर कोने से अमेरिका जाने वाले लोगों को करना पड़ता है, पर “किंग खान” को इतना बुरा लगा कि अमेरिका से भारत फोन कर- कर के टीवी चैनलों को घंटे- घंटे भर के इंटरव्यू देते रहे और दुखड़ा रोते रहे अपने टूटे दिल का।
गुस्से में यह भी कहा, कि काश मैं स्वतंत्रता दिवस के दिन भारत में होता। ये बताना भूल गए “किंग खान” कि स्वतंत्रता दिवस पर अमेरिका क्या करने गए थे? क्या पैसे लेकर अप्रवासी भारतीयों के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे? या अपनी आने वाली फिल्म का प्रचार करने गए थे? ऎन स्वतंत्रता दिवस पर भारत के बजाए अमेरिका गए तो थे व्यवसायिक कारण से, फिर क्यों देशभक्ति का ढिंढोरा पीट रहे हैं कि काश मैं भारत में होता? पहले जाओ पैसे कमाने, लात खाओ तो देशभक्ति बघारो। तथाकथित किंग की “कंगलई” की कलई खुली तो बक-बक कर कान पका डाले जनता के।
नतीजा, गरीब जनता परेशान है मीडिया में इनकी रात- दिन की चर्चा से।
अब तो चैन तभी मिलेगा जब शाहरुख खान अमेरिका न जाएं।
ऎसा होता दिखते नहीं, सिरदर्द की गोलियों का उत्पादन ही बढ़ाना पड़ॆगा देश को।
कांग्रेस पार्टी द्वारा कारगिल युद्ध के शहीदों का अपमान
अगस्त 20, 2009Shamelessness, brazenness and crass apathy are mild words
to express one’s outrageousness at the utterly politically
insulting remarks made by Congress Party MP, Rashid Alvi on July 16, 2009 in a TV interview on the tenth anniversary of Indian Army’s heroic victory over Pakistan in the Kargil War. Belittling the valor and sacrifices of over 500 Officers and men of the Indian Army, this Congress Party MP boldly and shamelessly asserted to the TV channel that there was nothing to celebrate about the Kargil War victory as it was the BJP’s war and not India’s war. In rebuttal one is tempted to ask this Congress MP whether he and the Congress Party would own up India’s military debacle in 1962 against China because of Nehru’s strategic follies? Kargil was a splendid military victory in contrast. Sadly no one at the apex level in the Congress Party has chastised this Congress MP.
In an embattled security environment in which India today survives, the politicization of national security challenges and issues by the Congress Party is condemnable by all right thinking Indians. The Congress Government in power ignored the Kargil War victory and arranged no official celebrations presumably more out of regard for Pakistan’s sensitivities in view of this Government’s US-prodded renewed openings to Pakistan.
What a contrast when one saw the TV visuals only a month back of the Heads of State of USA, Britain and France gathered at the World War II cemeteries on the Normandy Coast in France to honor the war martyrs who sacrificed their lives against Germany.. The least that the Congress Prime Minister and the Congress President could have done was to go and lay wreaths at the India Gate Amar Jawan Jyoti.
This Congress MP would not have dared to make such outrageous and insulting remarks against the Kargil Martyrs had this issue not been debated within the Congress Party which probably led him to brazenly make these offensive remarks nonchalantly as the TV visuals indicate.
The BJP as the main Opposition Party and the Indian media also need to be taken to task as their reactions were muted and not vociferous in their condemnation of these insulting remarks. Editors-in-Chief of the media who pontificate on inconsequentials otherwise, should have risen up to chastise the Congress Party
The brave Officers and men of the Indian Armed Forces fight valiantly and sacrifice their lives for India and Indians. As the father of one of the Kargil Martyrs so eloquently answered on TV that it was a kind of “Junoon’ that impelled them to do so. India’s soldiers do not fight for a political party or politicians.
But then such noble and higher sentiments are beyond the intellectual grasp of most of the Indian MPs who warm the benches in our Parliament House. The Congress Party’s own brigade of ‘Young MPs’ signally failed to rise to the occasion to condemn their own Congress MP for insulting the Kargil Martyrs. Was it lack of intellectual grasp of these ‘Young Congress MPs’ or was it intellectual bankruptcy to raise their voice out of political considerations
This Congress Government’s apathy seems to have only increased by its victory in the last elections.
India’s politicians do not realize that more than demoralizing the Indian Armed Forces by such insulting remarks against their sacrifices, such detestable remarks by MPs and especially from those of the ruling party would only generate contempt and not respect for them.
प्रधानमंत्री ने गाजा पर हमले की निंदा की
जनवरी 11, 2009वाह भाई क्या बात है प्रधान मंत्रीजी के कायराना बयान की. कोई इनसे पूछे की ये खुद तो अंतकवादियो के खिलाफ कुछ नही कर सकते है पर यदि इसराइल अपने नागरिको की सुरक्षा के लिए हमास जैसे आंतकवादी संघठन के खिलाफ कुछ कर रहा है तो ये महोदय सिर्फ़ कुछ मुस्लिम वोटो की खातिर अपनी नपुंसकता को जायज़ करार दे रहे है.
